हरियाणा के गुरग्राम मे मचा तेंदुओं का आतंक, जाने क्या है इसका कारण

Leopard In Haryana: हरियाणा के अरावली क्षेत्र, जिसमें गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह जिले शामिल हैं, अवैध अतिक्रमण बढ़ने, अवैध खनन और जंगल वाले इलाकों को कृषि भूमि में बदले जाने से वन क्षेत्र में तेजी से कमी आई है.

एक अन्य क्षेत्र, जिसके कारण तेंदुए अक्सर मानव बस्तियों में आ रहे हैं, उनके प्राकृतिक आश्रय में प्राकृतिक भोजन और जल संसाधनों की उपलब्धता की कमी है. नतीजतन, तेंदुओं

को जंगल से निकलना पड़ता है.कई जंगलों में तेंदुओं के लिए बहुत कम भोजन है, जिसने उन्हें शहरी आबादी के करीब आने के लिए मजबूर कर दिया है. यही कारण है कि मानव-तेंदुआ

संघर्ष का एक दुष्चक्र शुरू हो गया है. भूखा और हताश तेंदुए अब मानव आबादी के आसपास जाकर आवारा कुत्तों, बकरियों और छोटे पशुओं का शिकार करते हैं. जैसे ही सूर्य

अस्त होता है, ये भोजन खोजने के लिए मानव बस्तियों की ओर बढ़ते हैं. कुत्ते और बकरियां इनके पसंदीदा लक्ष्य हैं. इनका सामना जब मनुष्य से होता है,

तब वे भागने के लिए मजबूर होते हैं, क्योंकि लोग तेंदुओं का पीछा करते हैं, वे लाठियों और पत्थरों से उन्हें गंभीर रूप से घायल कर देते हैं या मार देते हैं.

क्यों तेंदुआ देखे जा रहे हैं?
गुरुग्राम और उसके आस-पास के इलाकों में पिछले वर्षो में 64 से अधिक तेंदुए देखे गए. साल 2017 में एक बड़ी घटना हुई. एक तेंदुआ मानेसर स्थित मारुति सुजुकी संयंत्र में घुस गया.

इसे वन विभाग के अधिकारियों ने 35 घंटे के बाद बचाया. इसी संयंत्र में अक्टूबर 2022 में तेंदुआ फिर दिखा था.सितंबर 2022 में डीएलएफ रेजिडेंशियल सोसाइटी में भी एक तेंदुए

को देखा गया था. उस समय प्राधिकरण ने निवासियों को सचेत रहने को कहा था. हालांकि, बड़ी बिल्ली जंगल में लौट गई. साल 2017 में मंडावर के ग्रामीणों ने तीन साल के एक तेंदुए को गांव में भटकता देखने पर उसे पीट-पीट कर मार डाला था.

विभाग ने क्या कहा?

मंडावर गांव के धनसिंह नंबरदार ने कहा कि तेंदुआ भोजन और पानी की तलाश में रिहायशी इलाके में चले आते हैं. लोग जान गंवाने के डर से अपने क्षेत्र में आने वाले तेंदुओं को मार

देते हैं. उन्होंने कहा कि ग्रामीण तेंदुए को इसलिए पत्थरबाजी कर मारते हैं, क्योंकि उन्हें जंगली जानवरों से निपटने का कोई और तरीका पता नहीं है.


हालांकि, गुरुग्राम जिला प्रशासन और वन विभाग ने कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) कार्यक्रमों के तहत जल संसाधनों की व्यवस्था की है.

विभाग ने अरावली वन क्षेत्र में वाइल्डलाइफ कॉरिडोर भी बनाया है, ताकि जानवर इधर-उधर घूम सकें और मानव-पशु संघर्ष से बचा जा सके.

वन विभाग के मुख्य अनुरक्षण अधिकारी एम.एस. मलिक के अनुसार, विभाग ने नियमित रूप से देखे जाने वाले तेंदुओं का हवाला देते हुए गुरुग्राम जिले में अरावली पर्वत श्रृंखला में

विभिन्न स्थानों पर आठ से दस वन चौकियों का निर्माण किया है. वन क्षेत्र में किसी भी तरह की अवैध गतिविधियों या अतिक्रमण पर कड़ी नजर रखने के लिए कई वन रक्षकों को भी तैनात किया गया है.


विभाग ने अरावली क्षेत्र में वन चौकियों के अलावा अरावली र्रिटीट, रायसीना गांव, मानेसर, ग्वाल पहाड़ी, सहरावां, भोंडसी गैरतपुर बास, कासन, मंडावर, मंगर और दमदमा क्षेत्रों में

अस्थायी चौकियों का निर्माण किया है. ये इलाके तेंदुओं की ज्यादा संख्या के लिए जाने जाते हैं.मलिक ने कहा, “जंगली जानवरों की रक्षा और उन्हें शहरों में प्रवेश करने से रोकने के लिए विभाग अरावली क्षेत्र में गड्ढों को पानी से भरवा रहा है.

साथ ही, हमने वन क्षेत्र से गुजरने वाली सड़कों पर चेतावनी बोर्ड लगाए हैं, ताकि अप्रिय घटनाओं से बचा जा सके. हमने जानवरों के लिए रास्ते भी साफ कर दिए हैं, ताकि वे सड़कों को पार किए बिना जंगल में कहीं भी आ-जा सकें.”

पर्यावरणविदों ने क्या कहा?

पर्यावरणविदों के अनुसार, अरावली क्षेत्र में ज्यादातर अवैध अतिक्रमण 1980 के दशक के आसपास शुरू हुआ, जब भूमि के निजीकरण की अवधारणा शुरू हुई.

साल 1992 में गुरुग्राम में अंसल रियल्टर्स ने अरावली र्रिटीट में फार्महाउस विकसित किए, जो अरावली वन क्षेत्र के मध्य में स्थित है.


अरावली बचाओ आंदोलन की संस्थापक सदस्य नीलम अहलूवालिया ने कहा, “जंगली जानवरों का मानव बस्तियों में जाना अरावली क्षेत्र में वर्षो से जारी अतिक्रमण और अवैध

निर्माण का परिणाम है. मनुष्य अरावली क्षेत्र में अतिक्रमण कर रहे हैं और अरावली रेंज का लगभग 25 फीसदी हिस्सा खनन के कारण पहले ही नष्ट हो चुका है. खराब शहरी नियोजन के कारण ही वन्यजीव खुले में आ रहे हैं.”

मास्टर प्लान 2021 क्या है?

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र योजना समिति द्वारा तैयार मास्टर प्लान 2021 में अरावली के 60,000 हेक्टेयर क्षेत्र को वन क्षेत्र घोषित किया गया है, जिसमें से केवल 0.5 प्रतिशत का

उपयोग मनोरंजक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है. साल 1984 में विकसित पंजाब भूमि संरक्षण अधिनियम की धारा 4 और 5 के अनुसार, जंगल में किसी भी भूमि का उपयोग निर्माण के लिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसे संरक्षित किया जाना है.


नीलम अहलूवालिया ने कहा, “सरकार वन्यजीवों की रक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठा रही है. अरावली क्षेत्र में पानी के स्रोत गर्मी में सूख जाते हैं, इसलिए जंगली जानवर पानी की

तलाश में मानव बस्तियों में जा रहे हैं. सरकार को जानवरों की जरूरतों, विशेष रूप से जल संसाधनों पर काम करने की जरूरत है. बड़े-बड़े गड्ढे बनाकर उनमें पानी भरने की जरूरत है.”